शुक्रवार, 31 जुलाई 2009

चलना -चलना और चलना
अनथक मन करता रहता सदा यात्रा
पकड़ता बार- बार उन घटनाओं को
जो बीत गयीं पर रीती नही
जो घटी बार -बार
झांक झांक पड़ती
मन के झरोखों से
दौड़ती चेतना के इस पार उस पार
भटकती तलाशती उसे जो नही मिला
पार था इप्सित
रहता नही चाँद हरदम रात क्र साथ
छोड़ देता है सूरज भी का हाथ
सूख जाती नदी एक दिन
रुक जाती हर गति एक दिन
नही रूकती इस मन की गति
हर पल कलती अनथक
गुजरे- अन्गुजरे पलों के बीछkया यही है जिन्दगी?

2 टिप्‍पणियां:

  1. mann ki gati kabhi nahi thamti. yadi ye tham jaye to hum jeewan-heen nahi ho jayenge ?
    bahut achchhi rachna hai didi.
    likhte rahiyega.

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